उत्तर प्रदेश में पिछड़ों और दलितों को मिल सकता है आरक्षण कोटे के भीतर कोटा, तैयारी में योगी सरकार

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उत्तर प्रदेश में योगी सरकार पिछड़ों और दलितों के आरक्षण को लेकर बड़ा फैसला कर सकती है। सामाजिक न्याय समिति की सिफारिशों को लागू करने पर योगी सरकार में शासन स्तर पर सहमति बन गई है। इसके तहत राज्य में दलितों और पिछड़ों को कोटे में भी कोटा दिया जा सकता है जैसा कि पहले से कई राज्यों में चल रहा है और यूपी के कई सियासी दल भी इसकी मांग करते रहे हैं। खबरों के मुताबिक जल्द ही सरकार आरक्षण का नए सिरे से बंटवारा करने के लिए आरक्षण से जुड़ा प्रस्ताव कैबिनेट में लाएगी। कैबिनेट की मंजूरी के लिए समाज कल्याण विभाग आरक्षण को लेकर पूरा मसौदा तैयार कर रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले साल सामाजिक न्याय समिति गठित की थी, जिसने पिछले साल दिसंबर में अपनी रिपोर्ट पेश की थी। रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि राज्य की 79 पिछड़ी जातियों को तीन हिस्सों में बांटकर आरक्षण दिया जाए। इसी तरह से राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में 2001 में तत्कालीन मंत्री हुकुम सिंह की अध्यक्षता में सामाजिक न्याय समिति बनी थी। इसने अपनी सिफारिशों में दलितों के आरक्षण को दो श्रेणियों में बांटकर नये सिरे से आरक्षण का निर्धारण की जरूरत जतायी थी। माना जा रहा है कि पिछले साल बनी ओबीसी की सामाजिक न्याय समिति और हुकुम सिंह कमेटी की रिपोर्ट को मिलाकर नये सिरे से कोटा तय होगा।

इससे अन्य पिछड़ा वर्ग और अनुसूचित जाति-जनजाति की उन जातियों को आरक्षण का पूरा लाभ मिल सकेगा, जो अब तक आरक्षण के फायदे से वंचित रही हैं। सूत्रों के हवाले से मिली खबरों के मुताबिक अन्य पिछड़ा वर्ग को मिल रहे आरक्षण को तीन भागों 7, 9 और 11 फीसदी में बांटा जा सकता है। अनुसूचित जाति के आरक्षण को दो भागों 10 और 11 फीसदी में बांटा जा सकता है, हालांकि यह आंकड़े कैबिनेट में आने के बाद ही पक्के तौर पर बताए जा सकेंगे।

पिछड़ों और दलितों को मिल रहे आरक्षण में कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था बिहार, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में लागू है। बिहार में कोटे के भीतर कोटे की व्यवस्था को गेमचेंजर माना जाता है क्योंकि इससे सत्ताधारी जेडीयू को काफी फायदा मिला, इसलिए इस मसले को लेकर सियासी घमासान भी पक्का है।