उपचुनावों में जो जीता वही देगा 2022 में भाजपा को टक्कर

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उत्तर प्रदेश में जल्दी ही 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं, इनमें से हमीरपुर सीट के लिए तो तारीखों का ऐलान भी हो चुका है। यह उपचुनाव भाजपा से ज्यादा विपक्षी दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उनके पास अब खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। इन उप चुनावों में जो ज्यादा से ज्यादा हासिल कर लेगा वही सियासत में खड़ा रह पाएगा और सत्तारूढ़ भाजपा को 2022 के विधानसभा चुनावों में टक्कर दे पाएगा।

ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि हाल के दिनों में भाजपा लगातार मजबूत होती गई है और लोकसभा चुनावों के बाद तो सीन बिल्कुल ही बदल गया है। केंद्र की मोदी सरकार के लगातार बड़े फैसलों और साथ में भाजपा संगठन की जबरदस्त सोशल इंजीनियरिंग से भाजपा का जनाधार बहुत बढ़ा है। हर वर्ग के लोग पार्टी से जुड़ते जा रहे हैं और अपनों तक को रोक लेने के लिए विरोधी दलों की कोई तरकीब काम नहीं कर रही।

राज्य के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी लोकसभा चुनावों के दौरान बनी एकता को बरकरार नहीं रख सके और कांग्रेस अपनी खिसकी जमीन तलाश नहीं पा रही। लोकसभा चुनाव नतीजों से साफ हो चुका है कि प्रियंका गांधी वाड्रा भी बेअसर ही साबित हुईं। इन उपचुनावों में बसपा भी चुनाव लड़ रही है और सबसे पहले उम्मीदवारों का ऐलान करके उसने बढ़त लेने की कोशिश भी की है। पार्टी ने जिस हिसाब से टिकट दिए हैं उससे साफ है कि वह दलित-मुस्लिम के साथ अगड़ा कार्ड को फिर से आजमाना चाहती है।

मायावती इसी फॉर्मूले से 2007 में अपने दम पर यूपी की सत्ता के शीर्ष तक पहुंची थीं। यह फॉर्मूला है दमदार। अगड़ी जातिया और मुस्लिम अगर मायावती के साथ गए तो मायावती को भला कौन रोक सकता है, लेकिन कोई फॉर्मूला हमेशा काम करे इसकी कोई गारंटी भी नहीं। लोकसभा चुनाव में बसपा शून्य से 10 पर पहुंची तो इसमें सपा से गठबंधन का बड़ा हाथ था, सपा के वोटरों ने बसपा को वोट दिया इसमें कोई शक नहीं। अलग होने पर सपा का साथ नहीं मिलेगा। मुस्लिमों के एक वर्ग में इस बात को लेकर काफी नाराजगी देखी जा रही है कि मायावती ने भाजपा को रोकने के लिए सपा का साथ देना जारी नहीं रखा। अगड़ी जातियों की पहली पसंद भाजपा है, सिर्फ उम्मीदवार के नाम पर पूरा अगड़ा वोटबैंक इधर-उधर नहीं हो सकता।

उधर सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सामने चुनौती यह है कि पिछड़ों में सिर्फ यादव और मुसलमान ही उसके साथ रह गए हैं। अन्य वर्गों को जोड़ने के लिए पार्टी कोई फॉर्मूला नहीं ला पाई है। पिछले दिनों सुहेलदेव भारतीय समाजपार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर से मुलाकात के बाद संभावना बढ़ी है कि दोनों पार्टियों में गठबंधन हो जाए, लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं होगा। नए भारत में सोशल इंजीनियरिंग चुनावी गणित को ठीक करने का एक फॉर्मूला तो है लेकिन सिर्फ इसी से चुनाव नहीं जीता जा सकता।

युवा वर्ग चाहे वह किसी भी जाति या समुदाय का हो अच्छी शिक्षा, विकास, भ्रष्टाचार का अंत, ढुलमुल की बजाय काम करने वाला सरकारी तंत्र चाहता है, वह स्वभाव से राष्ट्रवादी है। समाजवादी पार्टी का इन मुद्दों पर लगभग खामोश है, उसके पास इन मुद्दों पर कोई विज़न नहीं है। यही वजह है कि युवा उससे नहीं जुड़ रहे हैं। सिर्फ जाति या धर्म निरपेक्षता के नाम पर उन्हें नहीं जोड़ा जा सकता और युवाओं की अनदेखी कर जीता भी नहीं जा सकता।

राजनीति में कब क्या हो जाए, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है लेकिन आज के राजनीतिक हालात में तो भाजपा के सामने कोई भी विरोधी दल खड़ा हो पाता नहीं दिखता। उपचुनाव वाली 13 में से 11 सीटें भाजपा के पास ही रही हैं, साथ ही सत्ता में रहने का फायदा भी भाजपा के साथ है। सोशल इंजीनियरिंग में भी भाजपा 50 फीसदी से ज्यादा का हिसाब कर चुकी है, ऐसे में विपक्ष कोई बिल्कुल नया और धांसू फॉर्मूला लेकर जब तक सामने नहीं आता उसकी दाल गलती नहीं दिखाई दे रही। बिना नए फॉर्मूले के लिए 2022 में भी विपक्ष वहीं खड़ा दिखेगा जहां कि आज है। फ्रेंड्स इस पूरे सियासी माहौल पर आपकी क्या राय है, कमेंट करके हमें भी बताएं।