छात्रों और मजदूरों का गुस्सा चुनावों में नीतीश पर पड़ सकता है भारी

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लॉकडाउन में देश के दूसरे राज्यों में फंसे बिहार के छात्रों और मजदूरों के मुद्दे पर बिहार में सियासत गरमाई हुई है। विपक्षी दल जहां लगातार सरकार पर निशाना साध रहे हैं वहीं जिनके अपने दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं, उनमें भी नीतीश सरकार के प्रति भारी गुस्सा देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या नीतीश कुमार को इस गुस्से का खामियाजा आगामी विधानसभा चुनावों में भी उठाना पड़ सकता है क्योंकि चुनावों में अब सिर्फ 4-5 महीनों का ही वक्त रह गया है।

कोटा, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, पुणे, बेंगलुरू समेत देश के तमाम बड़े शहरों में शिक्षा और कामकाज के सिलसिले में गए लोगों की संख्या 17 लाख के करीब बताई जा रही है। इनमें से बड़ी संख्या में लोग वापस आना चाहते हैं लेकिन ट्रेन और बस सेवा बंद होने से वह बेबस हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों ने अपने राज्य के छात्रों और मजदूरों के लिए सरकार इंतजाम करके उनकी घर वापसी कराई है लेकिन नीतीश कुमार ऐसा कुछ नहीं कर रहे। बल्कि अपने ताजा बयान में उन्होंने फिर कहा है कि ऐसा करना लॉकडाउन के नियमों के खिलाफ होगा और इस सिलसिले में एक ही नीति होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री नियम बता रहे हैं लेकिन जिन लोगों के अपने दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं उनमें सरकार के प्रति भारी नाराजगी है। उनकी बेचैनी इस बात से समझी जा सकती है कि कोई साधन नहीं होने पर वह हजारों किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करके अपने घर आने की कोशिश कर रहे हैं। छात्रों के मामले में भी अभिभावक अपने बच्चों को किसी भी तरह से वापस लाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। इससे अपने घर आने के लिए लोगों की छटपटाहट को समझा जा सकता है।

सरकार के रवैये के खिलाफ विपक्षों दलों में से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और आरएलएसपी प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने लगातार मोर्चा खोला हुआ है। तेजस्वी यादव और उनके भाई तेज प्रताप ने तो यहां तक कहा कि अगर नीतीश सरकार छात्रों को नहीं ला सकती तो वह उन्हें जाने दे, वह कोटा से छात्रों को लेकर आएंगे। ऐसा करके विपक्ष ने सहज ही सहानुभूति बटोरी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नराज बिहार की जनता क्या चुनावों में एक बार फिर नीतीश सरकार पर भरोसा जताएगी?

बिहार की राजनीति पर नजर रखने वाले जानकारों की मानें तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके गठबंधन को कोरोना काल में उपजे जनता के आक्रोश का सामना करना पड़ सकता है। छात्रों और मजदूरों के प्रति जैसा रवैया नीतीश सरकार का दिखा उससे छात्रों के अभिभावकों और अप्रवासी मजदूरों दिल नीतीश से उखड़ गया है। यूपी-एमपी जैसे राज्यों में छात्रों और मजदूरों को लेकर सरकारों का रुख नरम है वहीं बिहार सरकार की सख्ती से प्रवासियों का गुस्सा सरकार के प्रति और भी बढ़ रहा है।

कोरोना संकट लंबा चल सकता है लेकिन जिस तरह से संकेत मिल रहे हैं उसके अनुसार लॉकडाउन हटने या फिर कुछ रियायतें देने से प्रवासी जल्दी ही लौटने लगेंगे। बिहार में विधानसभा के चुनाव सितंबर-अक्टूबर या फिर नवंबर तक होंगे। चुनाव का वह वक्त दुर्गापूजा और छठ पर्व का भी रहेगा। ऐसे में उस वक्त प्रवासियों की बड़ी संख्या राज्य में होगी और उनके दिल पर लगे जख्म नीतीश की पार्टी पर भारी पड़ सकते हैं।

नीतीश के पक्ष में अभी सिर्फ एक बात जा रही है और वह काफी बड़ी है, वह यह कि बिहार में अभी कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या काफी कम है। नीतीश अगर इसे कम ही रख पाए तो वह लोगों को समझा सकेंगे कि उनकी सख्ती की वजह से ही कोरोना से होने वाला नुकसान कम से कम रहा। हालांकि ध्यान देने वाली बात यह भी है कि पिछले कुछ दिनों से कोरोना के मामले बढ़ने भी लगे हैं।