सपा-बसपा गठबंधन का अंत, मायावती की क्या है रणनीति?

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लोकसभा चुनावों से पहले 12 जनवरी 2019 को जब बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि देशहित में गेस्ट हाउस कांड को किनारे रखते हुए उन्होंने समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया है तो माना गया था कि यह साथ लंबा चलेगा, कम से कम यूपी के विधानसभा चुनावों तक तो चलेगा ही लेकिन ऐसा हुआ नहीं। गठबंधन को यूपी की सियासत में गेमचेंजर के तौर पर देखा गया लेकिन महज छह महीनों के अंदर ही मायावती और अखिलेश यादव की राहें जुदा हो गई हैं।

मायावती ने समाजवादी पार्टी पर हमला बोलते हुए कहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद एसपी का व्यवहार देखकर लगा कि ऐसा करके बीजेपी को आगे हरा पाना संभव नहीं है। मायावती ने ट्वीट कर लिखा कि ‘जगजाहिर है कि सपा के साथ सभी पुराने गिले-शिकवों को भुलाने के साथ-साथ सन् 2012-17 में एसपी सरकार के बीएसपी व दलित विरोधी फैसलों, प्रमोशन में आरक्षण विरुद्ध कार्यों एवं बिगड़ी कानून व्यवस्था आदि को दरकिनार करके देश व जनहित में एसपी के साथ गठबंधन धर्म को पूरी तरह से निभाया। परंतु लोकसभा आमचुनाव के बाद एसपी का व्यवहार बीएसपी को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या ऐसा करके बीजेपी को आगे हरा पाना संभव होगा? जो संभव नहीं है।’

मायावती ने आखिर में ऐलान किया कि पार्टी व मूवमेंट के हित में अब बीएसपी आगे होने वाले सभी छोटे-बड़े चुनाव अकेले अपने बूते पर ही लड़ेगी। मायावती ने रविवार को बीएसपी के विधायकों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की थी जो करीब ढाई घंटे चली। इस दौरान उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ हुए गठबंधन और उसके परिणाम पर बात की।

सपा-बसपा गठबंधन टूटने के संकेत बसपा सुप्रीमो मायावती ने कुछ दिनों पहले ही दे दिया था जब उन्होंने लोकसभा चुनाव नतीजे आने के चंद दिनों बाद ही ऐलान कर दिया था कि बसपा उपचुनावों में हिस्सा लेगी। हालांकि तब उन्होंने सपा के साथ भविष्य में गठबंधन की संभावना बरकरार रखी थी, अब सोमवार 24 जून 2019 को उन्होंने साफ कर दिया है कि अब गठबंधन नहीं होगा। सवाल यह है कि मायावती ने आखिर ऐसा क्यों किया जबकि गठबंधन का सबसे ज्यादा फायदा उन्हें ही मिला था। जिस गठबंधन के लिए उन्होंने गेस्टहाउस कांड तक को भुला दिया था उसे तोड़ने की पहल खुद क्यों करनी पड़ी?

दरअसल इसके पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षा है। याद कीजिए लोकसभा चुनावों के दौरान उस वक्त को जब अखिलेश यादव ने कहा था कि वह मायावती को प्रधानमंत्री बनाएंगे और मायावती उन्हें मुख्यमंत्री बनने में मदद करेंगी। मायावती ने भी प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा दबा कर नहीं रखी। लेकिन नतीजों ने पूरी प्लानिंग फेल कर दी। ऐसी नौबत ही नहीं आई कि अखिलेश, मायावती को प्रधानमंत्री बना सकें, वहीं अब अगर मायावती अगर अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनने में मदद करें तो फिर उनकी सियासत और समर्थकों का क्या होगा?

मायावती अगर प्रधानमंत्री बन गई होंतीं या फिर केंद्र की सत्ता में किसी और पद पर भी चलीं जातीं तब भी बात और थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाने के बाद अगर वह यूपी में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने में मदद करतीं तो उनकी पार्टी को भारी नुकसान हो सकता था। वोट बैंक खिसकने से लेकर उनकी पार्टी में भयानक टूट तक हो सकती थी। अलग चुनाव लड़ने से उनका कोर वोट बैंक उनके साथ बना रहेगा और परिस्थितियां बनीं तो फिर से गठबंधनों के सहारे मुख्यमंत्री बनने का रास्ता भी खुला रहेगा। सपा के साथ रहने में अब कोई फायदा नहीं था, इसीलिए उन्होंने अलग रास्ता चुना, दुश्मनी बढ़ जाए इसके लिए उन्होंने सपा और इसके नेताओं पर कई आरोप भी लगा दिए। बहरहाल अब देखना यह होगा कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव क्या कहते हैं।