समाजवादी पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल खड़ा करने वाला है मायावती का यह दांव

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लोकसभा चुनावों के बाद समाजवादी पार्टी जहां अभी तक सदमे से बाहर निकली नहीं दिखाई देती वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी पार्टी को काफी तेजी से मजबूत बनाने में जुटी हुई हैं। सपा के साथ लोकसभा चुनावों के दौरान गठबंधन का ज्यादा फायदा बसपा को ही मिला, बावजूद इसके मायावती ने अपनी सहूलियत को देखते हुए गठबंधन खत्म कर लिया और अब उन्होंने बड़े संगठनात्मक बदलाव किए हैं जो कि समाजवादी पार्टी के कोर वोटबैंक पर बड़ा असर डाल सकते हैं।

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती एक बार फिर से सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता में वापसी करना चाहती हैं। उन्होंने राज्य के सियासी समीकरण को साधने के लिए बुधवार को बसपा के यूपी प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा को हटा कर मुनकाद अली को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। उन्होंने लोकसभा में दानिश अली की जगह श्याम सिंह यादव को नेता बनाया दूसरे सांसद रितेश पांडेय को लोकसभा में पार्टी का उपनेता बनाया।

इस फेरबदल का साफ मकसद मुस्लिम और यादव वोटबैंक को साधना है जो कि समाजवादी पार्टी का मूल वोटबैंक माना जाता है। इसके अलावा उन्होंने ब्राह्मण समुदाय को भी साधकर चलने की कोशिश की है। मायावती ने आरएस कुशवाहा की जगह जिन मुनकाद अली को उत्तर प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी है वह पश्चिमी यूपी से आते हैं और प्रभावी नाम हैं। इस बार के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में भाजपा के गढ़ में सेंध लगा कर दो मुस्लिम सांसद जिताने में कामयाब रहीं मायावती मुनकाद के जरिए पश्चिम यूपी के मुसलमानों में अपनी पैठ ज्यादा मजबूत करना चाहती हैं।

इसके अलावा मायावती ने नौकरशाह से नेता बने श्याम सिंह यादव को लोकसभा में नेता बनाकर यादव समुदाय को बड़ा संदेश दिया है कि बसपा का जुड़ाव यादव वोटरों के प्रति भी है। मायावती ने सपा से रिश्ता तोड़ा था तब भी कहा था कि यादव वोटरों पर सपा की पकड़ नहीं रह गई है। इसके अलावा उन्होंने ब्राह्मणों को साथ जोड़कर रखने की भी कोशिश की है। राज्यसभा में जहां ब्राह्मण चेहरे के तौर पर सतीश चंद्र मिश्र पहले ही हैं, वहीं लोकसभा में रितेश पांडेय को उपनेता बनाकर मायावती ने संदेश दिया है कि ब्राह्मण समुदाय को वह पूरी तवज्जो दे रही हैं।

सिर्फ इतना ही नहीं मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किया तो मायावती ने इसका समर्थन किया। मायावती देश भर में राष्ट्रवादी माहौल को भरपूर समझ रही हैं, वह जानती हैं कि युवा वर्ग इससे काफी ज्यादा प्रभावित है इसमें जाति, धर्म, समुदाय मायने नहीं रखता, इससे अलग हट कर नहीं चला जा सकता। इसीलिए उन्होंने अपनी राजनीति को नई दिशा देने की कोशिश की है। यूपी में दलित वोटरों की संख्या करीब 22 फीसदी, मुस्लिम वोटरों की संख्या 18 फीसदी और यादव वोटरों की संख्या 10 फीसदी के करीब मानी जाती है, मायावती इन्हें साध कर और अगड़ों में भी पैठ बना कर 50 फीसदी से ज्यादा का हिसाब बनाने की कोशिश में हैं।