अखिलेश यादव-मायावती के कोर वोटरों में सेंध लगाने के लिए भाजपा की खास रणनीति

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लोकसभा चुनाव में विरोधी दलों को करारी शिकस्त देने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने इन पार्टियों के कोर वोट बैंक पर नजरें जमा दी हैं। लोकसभा चुनाव में भाजपा को जैसी जीत मिली उससे जाहिर है कि उसे सपा के कोर वोटबैंक माने जाने वाले यादव और बसपा के कोर वोटर माने जाने वाले जाटव समाज का भी खूब वोट मिला। बीजेपी अब ऐसे वोटरों को हमेशा के लिए अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है।

भाजपा उत्तर प्रदेश में सदस्यता अभियान चलाएगी, और इसमें उसका फोकस सपा के यादव वोट बैंक और बसपा के जाटव वोट बैंक पर ज्यादा होगा। भाजपा के सदस्यता अभियान की शुरुआत जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जन्मदिन 6 जुलाई से होगी। भाजपा प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी के एक बयान के मुताबिक सपा ने यादव और बसपा ने जाटव वोटरों को सिर्फ वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है। सपा को वोट देकर फायदा सैफई कुनबे से जुड़े लोगों को ही मिला, गाजीपुर और गोरखपुर जैसे क्षेत्रों के यादव उपेक्षित ही रहे।

राकेश त्रिपाठी के मुताबिक भाजपा ने प्रधानमंत्री आवास योजना हो या फिर उज्ज्वला योजना के तहत गैस या मुफ्त में बिजली कनेक्शन, हर सरकारी योजना का फायदा बिना किसी भेदभाव के सभी समुदायों को देने का काम किया है, फिर वो चाहे यादव हों या जाटव समाज के लोग। इसीलिए यह सारे लोग वोटर के रूप में भाजपा से लोकसभा चुनाव में जुड़े हैं। ऐसे में पार्टी इन्हें भाजपा सदस्य और कार्यकर्ता बनाने की कोशिश में है।

हालांकि दबी जुबान से यह भी चर्चा है कि चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद यादव और जाटवों की अधिकता वाले बूथों पर भाजपा को ज्यादा वोट नहीं मिले। इसीलिए भाजपा अब इस मोर्चे पर काम करना चाह रही है। सदस्यता अभियान चला कर पार्टी ऐसे बूथों पर अपना जनाधार मजबूत कर लेना चाहती है ताकि 2022 के विधानसभा चुनावों में कोई परेशानी सामने न आए। भाजपा ने लोकसभा चुनावों से पहले यूपी में अलग-अलग जातियों के सम्मेलन किए थे, इनमें यादव सम्मेलन भी लखनऊ में हुआ था। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 11 यादवों को टिकट भी दिया, जिनमें से 9 जीते।

भाजपा की कोशिश है कि इन समुदायों से और नजदीकी बनाई जाय ताकि इनमें भी भाजपा के प्रति विश्वास बढ़े। यूपी में यादव समुदाय की संख्या 7 से 8 फीसदी के करीब और जाटवों की संख्या 14 फीसदी के करीब मानी जाती है। ऐसे वक्त में जब कि सपा-बसपा गठबंधन में दरार आ चुकी है भाजपा का यह दांव कारगर साबित हो सकता है।