‘भारत रत्न’ शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को गूगल ने किया याद

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बिहार के डुमरांव में 21 मार्च, 1916 को जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान पैगंबर बख्श खान के दूसरे नंबर के बेटे थे. उनके जन्म के समय उनके दादा रसूल बख्श खान एकदम बोले थे ‘बिस्मिल्लाह’ और इस तरह अमीरूद्दीन, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के तौर पर दुनिया भर में पहचाना गया. उनकी संगीत की शिक्षा मामू की देख-रेख में हुई, मामू वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर से जुड़े हुए थे. लेकिन शहनाई को देखने का नजरिया उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने ही बदला और इसे एक पहचान भी दिलाई. बिस्मिल्लाह खान ने 1937 में कलकत्ता ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में शहनाई का डंका बजा दिया.

उस्ताद बिस्मिल्लाह को बनारस की गलियों से बहुत प्यार था, और वहां उनकी जान बसती थी. लेखक यतींद्र मिश्र ने अपनी किताब ‘सुर की बारादरी’ में बिस्मिल्लाह खान के जरिये ही शहनाई को स्थापित करने की उनकी दास्तान सुनाई है. बिस्मिल्लाह खान ने बताया है कि सारंगी के दौर में शहनाई को पहचान दिलाना कोई आसान काम नहीं था.

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का सफर उनकी शहनाई की धुन की तरह ही काफी दिलचस्प रहा है. बिस्मिल्लाह खान ने संघर्ष भी देखा लेकिन हर पल को भरपूर जिया भी. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान शहनाई के जादूगर थे और उनकी शहनाई ने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचाया. यह बिस्मिल्लाह खान की शहनाई का ही जादू था कि उन्हें 2001 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया. बिस्मिल्लाह खान ताउम्र मस्तमौला रहे और उन्हें फक्कड़ी में जिंदगी जी. लेकिन उनकी शहनाई का जादू कभी कम नहीं हुआ. यही वजह रही कि उनकी 102वीं जयंती पर गूगल ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है

हमारा देश दुनियाभर में मिली-जुली संस्कृति का अप्रतिम प्रतीक कहा जाता है, और यह कतई साबित होता है जगप्रसिद्ध शहनाईवादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसी शख्सियतों से, जिन्होंने अपनी सारी उम्र संगीत को ही अपना धर्म माना, तथा ताउम्र जात-पात को नहीं माना…

सचमुच, देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाज़े गए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं, क्योंकि मुल्क का बच्चा-बच्चा उनके नाम, शोहरत और उनकी आजीवन साधना से भलीभांति परिचित है… संगीत के क्षेत्र में उनकी साधना के कायलों की तादाद हिन्दुस्तान में ही नहीं, दुनिया के समूचे गोले पर मौजूद है, जो उनकी शहनाई की तान सुन झूम-झूम उठते हैं..