अब क्या अपने दम पे UP जीत पाएंगे अखिलेश

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अखिलेश को साइकिल और समाजवादी पार्टी दोनों मिलने से जहाँ मुलायम खेमे में दुःख है वही अखिलेश वाली समाजवादी पार्टी में खुशी देखने को मिल रही है। इलेक्शन कमीशन ने समाजवादी पार्टी के सिंबल साइकिल के विवाद पर सोमवार को अखिलेश यादव के पक्ष में फैसला सुनाया|
मुलायम के पास दूसरा रास्ता ये है कि वह नए सिंबल पर चुनाव में उतरें। हालांकि, वे खुद चुनाव लड़ने जैसा खतरनाक कदम नहीं उठाएंगे। शिवपाल गुट के नेताओं को लेकर वे चुनाव में जा सकते हैं। हालांकि, इससे उन्हें कुछ खास फायदा नहीं होगा, क्योंकि यूपी में मुलायम की पकड़ वाले 10 जिले हैं। इसमें इटावा, मैनपुरी, एटा, कासगंज, बदायूं, कन्नौज, औरैया, फिरोजाबाद, फर्रुखाबाद और आजमगढ़ जैसे जिले शामिल हैं। 2012 में सपा ने इन 10 जिलों की 42 सीटों में से 36 सीटें जीती थीं। इस समय अखिलेश का ग्राफ बढ़ा है। ऐसे में, इन सीटों पर मुलायम सिंह ज्यादा से ज्यादा 8 से 10 सीट जीत सकते हैं। वहीं, बाकी सीटें अखिलेश के ही खाते में जाएंगी। अगर मुलायम लोकदल के सिंबल पर चुनाव में जाते हैं तो भी उनके नाम पर ज्यादा से ज्यादा 3 से 5 सीटें मिल सकती हैं। दरअसल, लोकदल कभी वेस्‍ट यूपी की प्रभावी पार्टी थी, लेकिन अब अजीत सिंह की रालोद के आगे उसका दबदबा खत्म हो गया है|
प्रदेश में 8 से 10 फीसदी यादव वोट है, जो अब अखिलेश यादव के साथ आ सकता है। दरअसल, 2012 में सपा को 66 फीसदी यादव वोट मिला था, इसलिए अभी भी ये कयास लगाए जा रहे हैं कि टकराव खत्म होने के बाद ये वोट फिर से सपा के पास आएगा।इसी तरह प्रदेश में लगभग 19 फीसदी मुस्लिम वोटर्स हैं, जो अब तक कशमकश की स्थिति में थे। 2012 में सपा को सबसे ज्यादा 39 फीसदी मुस्लिम वोट मिले थे। हालांकि, सोमवार को ही मुलायम सिंह ने कहा कि अखिलेश ने जो किया, उससे मुस्लिमों के बीच पार्टी की छवि खराब हुई|
वेस्‍ट यूपी में सपा कमजोर है, लेकिन कांग्रेस और आरएलडी से गठबंधन होने के बाद सपा यहां मजबूत हो सकती है। दरअसल, यहां 24 सीट सपा के पास है, जबकि अन्य दलों के पास 49 सीटें हैं। इसमें से कांग्रेस के पास 5, जबकि रालोद के पास 7 सीट है।
ऐसे में, तीनों के साथ आने से अखिलेश को फायदा मिल सकता है। अगर गठबंधन नहीं हुआ तो अखिलेश नुकसान में रह सकते हैं|
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इलेक्शन कमीशन के इस फैसले के बाद मुलायम को अपने 6 दशक के पॉलिटिकल करियर में सबसे बड़ा झटका लगा है। उनके पास एक रास्ता है कि अब वे अपने समर्थकों से कहें कि वे बूढ़े हो गए हैं। पार्टी और सिंबल अखिलेश को मिल गया है। ऐसे में समर्थक अखिलेश को सपोर्ट करें, ताकि पार्टी भारी बहुमत से जीतकर सत्ता में वापस आए। ये हो सकता है कि अब मुलायम खुद को पार्टी के मार्गदर्शक मंडल दल का अध्यक्ष मानकर अखिलेश के साथ चुनाव में जाएं|
अखिलेश को सबसे बड़ा फायदा ये मिलेगा कि सपा का जो परंपरागत वोटर है, उसका कन्फ्यूजन खत्म हो गया है। ऐसे में, वह साइकिल के सिंबल को ही देखकर वोट करेगा।
अखिलेश सरकार की 5 साल की जो नाकामियां हैं, अब उसका ठीकरा सीएम पार्टी के अंदर अपने विरोधियों पर फोड़ेंगे, जबकि विकास का सेहरा अपने सिर बांधेंगे। जिस तरह से कभी मुलायम धरतीपुत्र बनकर उभरे थे, उसी तरह अखिलेश की इमेज भी एक मजबूत लीडर के रूप में उभरकर सामने आई है।अखिलेश के कार्यकाल में उन पर साढ़े चार सीएम का आरोप लगता रहा है। विवाद के बाद वह उस इमेज से बाहर आ गए हैं|