भाजपा-सुभासपा, सपा-बसपा किसके लिए ज्यादा अहम हैं विधानसभा के उपचुनाव?

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यूपी में 13 विधानसभा सीटों पर कुछ महीने बाद होने वाले उपचुनाव सपा-बसपा-भाजपा और साथ ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में 11 विधानसभा सीटें विधायकों के सांसद बनने से खाली हो गई हैं और दो सीटें अन्य वजहों से खाली हुई हैं। अब इन 13 सीटों पर उप चुनाव होंगे, यह सीटें हैं-गंगोह (सहारनपुर), टूंडला, इगलास (अलीगढ़), मीरापुर (मुजफ्फरनगर), गोविंदनगर (कानपुर), लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, मानिकपुर (चित्रकूट), बलहा (बहराइच) जैतपुर (बाराबंकी), हमीरपुर, जलालपुर (अंबेडकरनगर) और रामपुर।

इन 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं और सितंबर-अक्टूबर तक ये उपचुनाव हो सकते हैं। इनके लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं क्योंकि ये उपचुनाव इन सभी के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सबसे पहले बात करें भाजपा की क्योंकि जिन 13 सीटों पर उपचुनाव होंगे उनमें 11 सीटें भाजपा के पास थीं। राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए उप चुनाव नतीजों से सरकार पर तो कोई असर नहीं होगा लेकिन ये चुनाव उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी गठबंधन के तहत चुनाव लड़े थे लेकिन इस उप चुनाव में दोनों विरोधी होंगे। भाजपा साबित करना चाहेगी कि सुभासपा से अलग होने का उस पर कोई असर नहीं है। इसके साथ ही लोकसभा चुनावों में कामयाबी का सेहरा पीएम मोदी के नाम रहा, उपचुनावों में जीत-हार सीधे सीएम योगी पर असर डालेगी।

इसी तरह से यह उपचुनाव सुभासपा के लिए भी बेहद अहम होंगे। लोकसभा चुनावों में पार्टी जहां भी लड़ी, ज्यादातर जगहों पर तीसरे नंबर पर रही। अब विधानसभा उपचुनावों में भी उसे अपनी ताकत दिखानी होगी। सुभासपा की वजह से भाजपा को अगर नुकसान पहुंचा या सुभासपा के उम्मीदवार चुनाव जीतने में कामयाब रहे तो इस पार्टी की साख बढ़ेगी और अगले विधानसभा चुनावों में वह गठबंधन और सीटों के लिए दूसरी पार्टियों से मनमुताबिक मोलभाव करने की स्थिति में रहेगी। बीजेपी को भी अहसास होगा कि सुभासपा का साथ छोड़ गलती हुई, लेकिन पार्टी असर छोड़ने में नाकाम रही तो फिर इसके भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा हो सकता है।

सपा-बसपा दोनों लोकसभा चुनाव गठबंधन करके साथ लड़े थे, लेकिन नतीजे आने के बाद गठबंधन टूट गया है। लोकसभा चुनाव में बसपा को 10 और सपा को 5 सीटें मिलीं। मायावती अब कह रही हैं कि सपा का कोई आधार नहीं रहा, उनके प्रत्याशियों को जीत दलित-मुस्लिम गठजोड़ से मिली। उपचुनावों में इसकी परीक्षा हो जाएगी। उधर उपचुनाव के नतीजो से सपा के जनाधार का भी फैसला हो जाएगा कि मायावती की बात कितनी सही है और यूपी के परंपरागत मुस्लिम वोट अखिलेश यादव के साथ हैं या नहीं।