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मैनपुरी-गणितज्ञ रत्नेश कुमार ने विद्यार्थियों को बताए अपने गणितीय महासूत्र एवं नवीन तर्क

मैनपुरी. गणितज्ञ एवं स्वतंत्र शोधकर्ता रत्नेश कुमार ने कक्षा 6 से 12 तक के विद्यार्थियों के समक्ष अपने गणितीय शोध एवं मौलिक तर्कों का रोचक प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने स्वयं विकसित किए गए ‘विभाज्यता के महासूत्र’ तथा ‘सबसे छोटी संख्या निर्माण के नवीन गणितीय तर्कों’ को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया।


मैनपुरी के सुगत इंटर कॉलेज में सोमवार को हुए कार्यक्रम की शुरुआत विद्यार्थियों से प्रचलित विभाज्यता के नियम पूछकर हुई। कुछ विद्यार्थियों ने 2, 5 और 10 से विभाज्यता के नियम आसानी से बताए, जबकि अन्य संख्याओं के नियम बताने में उन्हें कठिनाई हुई। इस पर रत्नेश कुमार ने विद्यार्थियों के सामने एक चुनौतीपूर्ण प्रश्न रखा कि क्या कोई ऐसा सार्वभौमिक सूत्र हो सकता है, जिसकी सहायता से प्रत्येक प्राकृतिक संख्या के लिए विभाज्यता का नियम स्वयं बनाया जा सके? विद्यार्थियों ने उत्सुकता के साथ इस चुनौती को स्वीकार किया।


इसके बाद उन्होंने अपने विभाज्यता के महासूत्र एवं दशक नियम को उदाहरणों सहित समझाया। सूत्र की सहायता से विद्यार्थियों ने स्वयं विभिन्न संख्याओं के विभाज्यता नियम बनाना सीखा। कुछ ही चरणों में अनेक विद्यार्थी अलग-अलग प्राकृतिक संख्याओं के लिए विभाज्यता के नियम बताने में सक्षम हो गए। इस गतिविधि ने विद्यार्थियों में गणित के प्रति उत्साह और तार्किक चिंतन को बढ़ावा दिया।
कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण विषय सबसे छोटी संख्या निर्माण के नवीन गणितीय तर्क रहे। रत्नेश कुमार ने विद्यार्थियों से पूछा कि 9 और 8 से बनने वाली सबसे बड़ी संख्या 98 तथा सबसे छोटी संख्या 89 है। इसी प्रकार 8 और 7 से बनने वाली सबसे बड़ी संख्या 87 तथा सबसे छोटी संख्या 78 है। फिर उन्होंने पूछा कि 1 और 0 से बनने वाली सबसे बड़ी तथा सबसे छोटी संख्या क्या होगी? विद्यार्थियों ने सबसे बड़ी संख्या 10 बताई, लेकिन सबसे छोटी संख्या कुछ ने 01 बताई तो कुछ ने 10 ही बताई।


रत्नेश कुमार शाक्य ने इस प्रश्न के माध्यम से विद्यार्थियों को पारंपरिक गणितीय नियमों और अपनी प्रस्तावित नवीन गणितीय अवधारणा के बीच अंतर स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि प्रचलित स्थानिक मान पद्धति एवं विद्यालयी पाठ्यक्रम के अनुसार 0 और 1 से बनने वाली सबसे छोटी दो अंकों की प्राकृतिक संख्या 10 तथा 0, 1 और 2 से बनने वाली सबसे छोटी तीन अंकों की प्राकृतिक संख्या 102 होती है। इसलिए वर्तमान पाठ्यक्रम एवं परीक्षाओं में विद्यार्थियों को इन्हीं उत्तरों का प्रयोग करना चाहिए।
इसके साथ ही उन्होंने अपनी शोधपरक अवधारणा ‘सबसे छोटी सम्भावित अंक व्यवस्था’ को स्पष्ट करते हुए बताया कि यदि शून्य को भी अंक-व्यवस्था में स्थान दिया जाए और प्रारंभिक शून्य की अनुमति हो, तो 0, 1 से बनने वाली सबसे छोटी अंक व्यवस्था 01 तथा 0, 1, 2 से बनने वाली सबसे छोटी अंक व्यवस्था 012 होगी।


उन्होंने 9 का अंतर, 11 का अंतर, 11 से विभाज्यता तथा अन्य गणितीय तर्कों के माध्यम से अपनी अवधारणा को उदाहरणों सहित समझाया। विद्यार्थियों को यह भी बताया कि गणित में किसी परिणाम को केवल याद करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके पीछे छिपे तर्क को समझना और उसकी तार्किक जाँच करना भी आवश्यक है।


कार्यक्रम के दौरान विद्यालय के विद्यार्थियों ने विशेष रुचि दिखाई तथा गणितीय प्रश्नों और उदाहरणों के माध्यम से नई अवधारणाओं को समझा।
इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को गणित के प्रति भयमुक्त बनाते हुए उनमें मौलिक चिंतन, तार्किक क्षमता, प्रश्न पूछने की प्रवृत्ति और स्वयं गणितीय नियम खोजने की वैज्ञानिक दृष्टि विकसित करना रहा।
इस अवसर पर विद्यालय परिवार की ओर से गणितज्ञ रत्नेश कुमार का भव्य स्वागत एवं सम्मान किया गया। विद्यालय प्रबंधक अजय सिंह शाक्य ने कहा कि “रत्नेश कुमार जी का गणितीय शोध वास्तव में सराहनीय है। विद्यार्थियों के सामने गणित को इतने सरल और रोचक ढंग से प्रस्तुत करना प्रशंसनीय है”


इस शैक्षिक प्रदर्शन में विद्यालय के प्रबंधक अजय सिंह शाक्य, प्रधानाचार्या नीलम शाक्य, गणित अध्यापक राजीव शाक्य, विज्ञान अध्यापिका रविन मैम, नीरज शाक्य, प्रदीप शाक्य, राधा बघेल, निहारिका कश्यप, सुबोध यादव, प्रदीप मिश्रा सहित विद्यालय परिवार के तमाम छात्र-छात्राएं और अन्य सदस्य उपस्थित रहे।